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VI. LINGUISTIC
DEVELOPMENT
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We have looked at the
linguistic development of Hindi in terms of the following phenomena:
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1. Script
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2. Phonology
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2. Lexicon
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3. Morphology
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6.1 Script-based Development
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Let us begin with looking
at the changes which have occurred in the script for Hindi i.e. Devnagri
(देवनागरी).

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Figure 2. Development
of Devnagri Alphabet
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(Source:
Dhirendra Verma, Hindi Bhasha aur Lipi)

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Figure 3. Development
of Devnagri Numerals
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(Source:
Dhirendra Verma, Hindi Bhasha aur Lipi)
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6.2 Phonological Development
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Some major changes have
taken place in the sounds of Hindi are articulated here:
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1. The use of Anuswaar
ं
(अनुस्वार)
now also
symbolizes the nasal consonants
ङ्, ञ्, ण्, न्
and
म्
.
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ङ् गङ्गा
→
गंगा
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ञ्
चञ्चल
→
चंचल
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ण्
दण्ड
→
दंड
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न्
सन्त
→
संत
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म्
सम्पत्ति
→
संपत्ति
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2. Annunasik
ँ (अनुनासिक)
is also used in place of Anuswaar
ं (अनुस्वार)
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3. The use of Visarg
ः
(विःसर्ग)
has
almost stopped and words seem to have simply deleted it. For example:
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दुःख
→
दुख, छः
→
छह
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4. A vowel which is not so
much in use now ‘ऋ’
is now pronounced as
‘रि’
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5. Words which used to end
in pure consonants now have a vowel attached to them
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जगत्
→
जगत
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भगवान्
→
भगवान
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6.2 Lexical Development
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We will look at changes in
nouns, pronouns, adjectives, and verbs.
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6.2.1 Nouns
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1. अग्नि
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अग्नि
→
अगिनि
→
अग्गि
→
आगि, आगी, आग
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ज्यों तिल माँहैं
तेल है, ज्यों चकमक में
आगि।
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तेरा साईं तुज्झ
में, जागि सकै तो जागि।। (कबीर)
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नयन स्त्रवहिं जलु
निज हित लागी।
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जरैं न पाव देह
बिरहागी।। (तुलसीदास, सुंदरकाण्ड)
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बूड़ी जल ही मैं
दिन-यामिनिहुँ जागी भौहें,
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धूम सिर छायो
बिरहागिनि बिलखियाँ।।
(देव, देव-सुधा)
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मैं हृदय में
अग्नि लेकर एक युग से जल रहा हूँ। (बच्चन, मधुशाला)
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2. नयन
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नयन
→
नैन, नैना
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नैनों
की कर कोठरी, पुतली पलंग बिछाय।
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पलकों की चिक
डारिके, पिय को लिया रिझाय।।
(कबीर)
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गारीं सकल कैकइहि
देहिं।
-
नयन
बिहीन कीन्ह जग जेहिं।।
(तुलसीदास,
अयोध्याकाण्ड)
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कपोलों में उर के
मृदु भाव
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श्रवण
नयनों
में प्रिय बर्ताव
;
(पंत, आँसू की
बालिका)
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3. प्रिय
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प्रिय
→
पिय
→
पी, पिया
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खुसरो रैन सुहाग
की, जागी पी के संग।
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तन मेरो मन
पियो को, दोउ भए एक रंग।। (खुसरो)
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नैनों की कर
कोठरी, पुतली पलंग बिछाय।
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पलकों की चिक
डारिके, पिय को लिया रिझाय।।
(कबीर)
-
-
कपोलों में उर के
मृदु भाव
-
श्रवण नयनों में
प्रिय बर्ताव
;
(पंत, आँसू की
बालिका)
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6.2.2 Pronouns
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1. उत्तमपुरुष
एकवचन मैं
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जिन ढूंढा तिन
पाइयाँ, गहरे पानी पैठि।
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हौं
बौरी बूड़न डरी, रही किनारे बैठि।।
(कबीर, सरस काव्य
संग्रह)
-
-
तूँ तूँ करता तूँ
भया, मुझ में रही न
हूँ।
-
वारी तेरे नाउ
परि, जित देखौं तित तूँ।।
(कबीर,
कबीर-मीमांसा)
-
-
ऐसो जु
हौं
जानतो कि जैहै तू विषै के संग,
-
एरे मन
! मेरे,
हाथ-पाएँ तेरे तोरतो
;
(देव, देव-सुधा)
-
-
प्रियतम, तू मेरी
हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला
(बच्चन, मधुशाला)
-
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2. मध्यमपुरुष
एकवचन तुम
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बालम आउ हमारै गेह
रे।
-
तुम्ह
बिन दुखिया देह रे।। (कबीर, कबीर-मीमांसा)
-
-
तूँ तूँ करता
तूँ भया, मुझ में रही न हूँ।
-
वारी तेरे नाउ
परि, जित देखौं तित तूँ।।
(कबीर,
कबीर-मीमांसा)
-
-
ऐसो जु हौं जानतो
कि जैहै तू विषै के संग,
-
एरे मन
! मेरे,
हाथ-पाएँ तेरे तोरतो
;
(देव, देव-सुधा)
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जहाँ कहीं मिल
बैठे हम-तुम वहीं गई हो मधुशाला। (बच्चन, मधुशाला)
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3. अन्यपुरुष
एकवचन वह
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सूरा
सोइ
सराहिए, लड़ै धनी के हेत।
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पुरजा पुरजा होइ
रहै, तऊ न छाँड़ै खेत।। (कबीर, सरस काव्य संग्रह)
-
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‘देव’
न देखति हौं दुति दूसरी,
देखें हैं
जा दिन ते ब्रज-भूप में,
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पूरि रही
री वही धुन कानन, आनन आन न ओप अनूप मैं
; (देव,
देव-सुधा)
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6.3 Morphological Development
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We will look at changes in
verb-endings and cases
(nouns and
pronouns)
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6.3.1 Cases - Pronouns
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1. उत्तमपुरुष
एकवचन मैं
-
-
ऐसो जु हौं जानतो
कि जैहै तू विषै के संग,
-
एरे मन
! मेरे,
हाथ-पाएँ तेरे तोरतो
;
(देव, देव-सुधा)
-
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2. मध्यमपुरुष
एकवचन तुम
-
-
ज्यों तिल माँहैं
तेल है, ज्यों चकमक में आगि।
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तेरा साईं
तुज्झ में, जागि सकै तो जागि।। (कबीर)
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हरि जननी मैं बालक
तोरा।
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काहे न अवगुन
बकसहु मेरा।।
(कबीर,
कबीर-मीमांसा)
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-
ऐसो जु हौं जानतो
कि जैहै तू विषै के संग,
-
एरे मन
! मेरे,
हाथ-पाएँ तेरे तोरतो
;
(देव, देव-सुधा)
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तूने
ही पहले बहु दर्शिनि, गाया जागृति का गाना
(पंत, प्रथम रश्मि)
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3. अन्यपुरुष
एकवचन वह
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जो तोकूँ काँटा
बुवै, ताहि बोइ तू फूल।
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तोहि फूल-के-फूल
हैं, वाको हैं तिरसूल।।
(कबीर, सरस काव्य
संग्रह)
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जिन ढूंढा
तिन
पाइयाँ, गहरे पानी पैठि।
-
हौं बौरी बूड़न
डरी, रही किनारे बैठि।।
(कबीर, सरस काव्य
संग्रह)
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6.3.2 Verb Endings
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1. मुस्कुराना
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परम बिनीत सकुचि
मुसुकाई।
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बोले गुर
अनुसासन पाई।। (तुलसीदास, बालकाण्ड)
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चूम नवल
कलियों का मृदु मुख,
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सिखा रहे
थे मुस्काना
!
(पंत, प्रथम रश्मि)
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2. जाना
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मात ह्वै
आपु जनी जगमात कियो पति तात सुतासुत
जायो (देव, देव-सुधा)
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शून्य
विश्व के उर में केवल साँसों का आना-जाना
!
(पंत, प्रथम रश्मि)
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3. उल्लासित होना
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राम अनुज
मन की गति जानी।
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भगत
बछलता हियँ हुलसानी।। (तुलसीदास, बालकाण्ड)
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साँवरे
अंग लसै पट पीत, हिये
हुलसै बनमाल सुहाई;
(देव,
देव-सुधा)
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4. जानना
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कथा
अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी।
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नहिं
आचरजु करहिं अस
जानी।। (तुलसीदास, बालकाण्ड)
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कातिक
पून्यो कि राति ससी दिसि पूरब अंबर मैं जिय
जान्यो (देव, देव-सुधा)
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